


Bikaner News राजस्थान 1st न्यूज,बीकानेर। प्रीति क्लब द्वारा आयोजित “म्हारी प्यारी गवरल कार्यक्रम लक्ष्मी हैरिटेज में श्रद्धा, संस्कृति और परंपरा के मनमोहक रंगों से सराबोर रहा। ग्वरजा माता की भक्ति से ओतप्रोत इस आयोजन ने राजस्थानी लोक संस्कृति की सजीव झलक प्रस्तुत करते हुए पूरे वातावरण को भक्तिमय और उल्लासपूर्ण बना दिया।


कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण ग्वरजा माता के गीतों और नृत्यों पर आधारित प्रस्तुतियां रहीं। कुल 11 समूहों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया, जिनमें 6 समूहों ने पारंपरिक वेशभूषा में मनोहारी नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को झूमने पर विवश कर दिया, वहीं 5 समूहों ने मधुर भक्ति गीतों के माध्यम से श्रद्धा और भावनाओं की गहराई को अभिव्यक्त करते हुए सभी को भाव-विभोर कर दिया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि सुशील थिरानी तथा विशिष्ट अतिथि ओमप्रकाश करनानी एवं रामप्रसाद मिमानी की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम की शोभा को और बढ़ाया। क्लब के सचिव रघुवीर झॅंवर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन हमारी सांस्कृतिक विरासत को संजोने के साथ-साथ समाज में एकता, प्रेम और सद्भाव को सुदृढ़ करने का कार्य करते हैं।
कोषाध्यक्ष बृजमोहन चांडक ने कहा कि प्रीति क्लब सदैव संस्कृति संरक्षण एवं सामाजिक सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध है। सुनील सारड़ा ने कार्यक्रम की सफलता में सभी सदस्यों एवं प्रतिभागियों के सहयोग की सराहना करते हुए आभार व्यक्त किया। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजी प्रतिभागियों ने जब मंच पर ग्वरजा माता की भक्ति को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया, तो उपस्थित दर्शक मंत्रमुग्ध हो उठे।
इस अवसर पर द्वारकाप्रसाद पचीसिया, शशिमोहन मुंधड़ा, सुनील सारड़ा, भवानीशंकर राठी, किशन सींगी, बाबूलाल मोहता, श्रीराम सींगी, नारायणी बिहाणी, भतमाल पेड़ीवाल, अशोक बागड़ी, नारायण दम्मानी, अनिल झूमर सोनी, रोहित पचीसिया, शिवनारायण राठी, जगदीश राठी, रघुवीर झॅंवर, याज्ञवल्क्य दम्मानी, बृजमोहन चांडक, दाऊलाल बिन्नाणी, कमल राठी, अनिल पेड़ीवाल, सुरेश दम्मानी, बालकिशन थिरानी सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रही।
कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया तथा मां ग्वरजा से सभी के सुख, शांति और समृद्धि की कामना की गई। भक्ति, संस्कृति और एकता का यह संगम “म्हारी प्यारी गवरल” के रूप में न केवल एक कार्यक्रम बना, बल्कि बीकानेर की सांस्कृतिक आत्मा का उत्सव बनकर सभी के हृदय में बस गया।