पत्नी के साथ दहेज को लेकर मारपीट और गर्भ गिराने का मामला,अधिवक्ता सुनीता दीक्षित ने पीडि़ता की और से की पैरवी

न्यायालय ने पति की सजा का रखा यथावत, अपील की खारिज

राजस्थान फस्र्ट न्यूज,बीकानेर। शादी के बाद पति और उसके परिवार द्वारा विवाहिता के साथ मारपीट कर घर से निकालने और दहेज के मामले में न्यायालय ने अपील को खारिज करते हुए सजा का यथावत रखा है। इस सम्बंध में आरोपी की और से पूर्व में सजा के आदेश पर अपर सेशन न्यायाधीश महिला उत्पीडऩ में अपील की गयी थी। जिस पर आज न्यायालय ने अपील खारिज की और न्यायाधीश रैना शर्मा ने पूर्व में किए गए निर्णय को यथावत रखा।

 

प्रार्थिया की और से अधिवक्ता सुनीता दीक्षित ने मजबूत पैरवी की और एक महिला होने के नाते दूसरी महिला की पीड़ा को समझा और सबूतों,दस्तावेजों के आधार पर अपील को खारिज करवाया है ।

यह है मामला- 22 दिसंबर 2015 को परिवादिया सुमन ने थाने में मुकदमा दर्ज करवाते हुए बताया था कि उसकी शादी 6 वर्ष पूर्व विनोद कुमार के साथ हुई। उसके माता-पिता ने शादी में हैसियत से ज्यादा दहेज दिया लेकिन ससुराल पक्ष ने कुछ समय बाद उसे दहेज के लिए परेशान करना शुरू कर दिया। प्रार्थिया ने बताया कि आरोपियों ने उसे मारपीट कर घर से निकाल दिया और शारीरिक प्रताडऩा दी। प्रार्थिया ने बताया था कि आरोपियों ने उसे जबरदस्ती गोली देकर ढ़ाई महीने का गर्भ गिरा दिया और स्त्रीधन हड़प लिया। प्रार्थिया ने अपने पति हिसार हरियाणा निवासी विनोद सहित ससुराल पक्ष पर मुकदमा दर्ज करवाया था।

 

पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की और मामले की जांच के बाद चालान पेश किया। जिस पर न्यायालय की और से सभी दस्तावेजों और सबूतों के आधार पर आरोपी विनोद उर्फ मनोज को दोषी माना और महिला उत्पीडऩ की विभिन्न धाराओं दोषसिद्ध माना गया। जिस पर दोषी को 3 साल की कारावास व एक हजार का जुर्माना का आदेश दिया गया।

अभियुक्त द्वारा उक्त निर्णय के विरुद्ध अपील प्रस्तुत की गई, जिसे न्यायालय ने विस्तृत साक्ष्यों, गवाहों के बयानों एवं रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों के सम्यक परीक्षण के पश्चात निरस्त कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना कि अभियोजन साक्ष्य विश्वसनीय, परस्पर संगत एवं पर्याप्त हैं तथा ट्रायल कोर्ट के निर्णय में किसी प्रकार की विधिक या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं पाई गई

सुनवाई के दौरान अधिवक्ता सुनीता दीक्षित ने पीडि़ता की ओर से पूरे प्रकरण के तथ्यों को मजबूती से न्यायालय के समक्ष रखा। उन्होंने यह स्थापित किया कि विवाह के पश्चात पीडि़ता को लगातार दहेज की मांग को लेकर मानसिक व शारीरिक प्रताडऩा दी गई, मारपीट की गई तथा अंतत: उसे घर से निकाला गया। गवाहों के सुसंगत बयान, चिकित्सकीय साक्ष्य एवं परिस्थितिजन्य तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया गया कि अभियुक्त का आचरण न केवल अवैध बल्कि महिला की गरिमा और वैवाहिक संस्था के विरुद्ध था।

 

न्यायाधीश रैना शर्मा अपर सत्र न्यायालय (महिला उत्पीडऩ प्रकरण), बीकानेर ने अपने निर्णय में यह भी उल्लेख किया कि ऐसे अपराध समाज में वैवाहिक विश्वास को ठेस पहुँचाते हैं और इनमें नरमी बरतना न्यायोचित नहीं है। परिणामस्वरूप अभियुक्त की अपील अस्वीकृत करते हुए सजा को बरकरार रखा गया और उसे न्यायिक अभिरक्षा में लेने के आदेश पारित किए गए ।

अधिवक्ता सुनीता दीक्षित की दृढ़ पैरवी, कानूनी समझ और पीडि़ता के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण के कारण यह संभव हो पाया कि वर्षों से संघर्ष कर रही पीडि़ता को न्याय की मजबूत आवाज मिली और कानून पर उसका विश्वास और सुदृढ़ हुआ।

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